सर्कल रेट क्या होता है?
सर्कल रेट, मार्केट रेट और स्टांप ड्यूटी — तीनों के बीच का रिश्ता समझें
सर्कल रेट — जिसे महाराष्ट्र जैसे कुछ राज्यों में 'रेडी रेकनर रेट' और अन्य जगहों पर 'गाइडलाइन वैल्यू' भी कहा जाता है — वह न्यूनतम प्रति वर्ग फीट/गज कीमत है, जिस पर राज्य सरकार किसी खास इलाके में प्रॉपर्टी की रजिस्ट्री की अनुमति देती है। यह रेट लोकेशन, इलाके के डेवलपमेंट, इस्तेमाल (रेज़िडेंशियल/कमर्शियल/एग्रीकल्चरल) के हिसाब से अलग-अलग तय होता है, और राज्य का रजिस्ट्रेशन/स्टांप डिपार्टमेंट समय-समय पर इसे अपडेट करता रहता है।
इसका मुख्य मकसद यह पक्का करना है कि प्रॉपर्टी की रजिस्ट्री बहुत कम, गलत बताई गई कीमत पर न हो — जिससे सरकार को स्टांप ड्यूटी और रजिस्ट्रेशन फीस के रूप में सही राजस्व मिल सके।
सर्कल रेट बनाम मार्केट रेट
| मार्केट रेट | खरीदार-विक्रेता के बीच असल तय हुई कीमत, मांग/लोकेशन के हिसाब से बदलती है |
| सर्कल रेट | सरकार द्वारा तय की गई न्यूनतम रजिस्ट्री कीमत, समय-समय पर अपडेट होती है |
रजिस्ट्री हमेशा डील वैल्यू और सर्कल-रेट-आधारित वैल्यू — इन दोनों में से जो ज़्यादा हो, उसी पर होती है, और स्टांप ड्यूटी उसी ऊंची वैल्यू पर लगती है।